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चिदंबरम ने साधा केन्द्र सरकार पर निशाना, कहा...

चिदंबरम ने साधा केन्द्र सरकार पर निशाना, कहा...

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने बीते गुरुवार को बोला कि अगर उच्चतम न्यायालय नागरिकता संशोधन कानून की वैलिडिटी को जारी रखता है व मुसलमानों को डिटेंशन कैंप में रखा जाता है तो देश में बड़े स्तर पर आंदोलन चलाया जाना चाहिए। इस मुद्दे पर जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में एक प्रोग्राम में चिदंबरम ने बताया कि असम में 19 लाख लोगों को एनआरसी से बाहर रखे जाने के पश्चात् सरकार सीएए लेकर आई ताकि इनमें से 12 लाख हिंदुओं को नागरिकता दी जा सके।

एक विद्यार्थी के सवाल किया कि यदि सीएए को उच्चतम न्यायालय वैध ठहराता है तो फिर आगे क्या कदम होने कि सम्भावना है? तब इस चिदंबरम ने बताया कि, “सूची से बाहर रहने वालों में सिर्फ मुस्लिम होंगे, उन्हें ढूंढ निकालने की प्रयास होगी व बाहर कर दिया जाएगा। वे (सरकार) घोषित कर देंगे कि मुसलमान देश का भाग नहीं हैं। यदि किसी मुसलमान को बाहर निकाला जाता है या डिटेंशन कैंप भेजा जाता है तो जन आंदोलन होना चाहिए। ” उन्होंने यह भी बताया कि कांग्रेस पार्टी का मानना है कि सीएए को पूरी तरह से समाप्त किया जाना चाहिए। वही इस पर सियासी स्तर पर कार्य हो, ताकि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को 2024 से आगे टाला जा सके। चिदंबरम ने यह भी बोला कि, “इस सरकार में किसी दिन आकस्मित जेएनयू का नाम मोदी या अमित शाह यूनिवर्सिटी किया जा सकता है। ” उन्होंने यह आरोप लगाया हुए बोला कि शाहीन बाग का प्रदर्शन भाजपा का एक मात्रा छलावा है। यदि बात करे तो इजराइल जैसे कई राष्ट्रों में धर्म के आधार पर नागरिकता दी जा रही है, पर हिंदुस्तान में यह संभव नहीं होने कि सम्भावना हैं। हमारा संविधान इसकी परमिशन नहीं देता हैं। हम धर्म आधारित उत्पीड़न का समर्थन नहीं कर सकते हैं। हमें शरणार्थियों के लिए कानून बनाने की जरूरत नहीं है।

चिदंबरम ने यह भी सवाल प्रकाश में लाये कि, ‘‘सीएए में 3 राष्ट्रों (बांग्लादेश, पाक व अफगानिस्तान) के अल्पसंख्यकों का ही जिक्र क्यों हैं? इसमें हमने नेपाल, भूटान व चाइना को सम्मिलित क्यों नहीं किया गया? पाक के अहमदिया व शिया, म्यांमार के रोहिंग्या व तमिल हिंदुओं पर भी जुल्म के बहुत से मुद्दे आते रहते हैं, तो फिर इन्हें बाहर क्यों रखा गया है?’’ एनआरसी पर सवाल उठाते हुए पूर्व वित्त मंत्री ने बताया कि संसार में शायद ही कोई कौन सा देश दस्तावेज से बाहर रहने वालों को स्वीकार करेगा? यह सवाल उन्होंने नरेन्द्र मोदी सरकार को टारगेट करते बोला हैं। हमारे देश धर्म प्रधान हैं व देश में इस तरह के कानून को लगा संभव नहीं हैं।


जानिए क्यों पड़ी इस दिन की जरुरत, भारत में मनाया गया पहला प्रोटीन डे ?

जानिए क्यों पड़ी इस दिन की जरुरत, भारत में मनाया गया पहला प्रोटीन डे ?

हर कोई जानता है कि हमारे शरीर के लिए प्रोटीन बेहद आवश्यक पोषक तत्व है, जो हमारे विकास में बड़ा सहयोग देता है. प्रोटीन का पर्याप्त सेवन व रेगुलर डायट में उसे शामिल करना बहुत ज्यादा आवश्यक है. किन्तु, जानकारी के अभाव में हमारे देश में लोग प्रोटीन के प्रति जागरुकता में पीछे हैं. इसी दूरी को मिटाने के लिए हिंदुस्तान में 27 फ़रवरी को प्रोटीन डे मना गया था.

अब से प्रति साल 27 फरवरी को प्रोटीन डे मनाया जाएगा. इसकी आरंभ की है एक राष्ट्रीय स्तर के पब्लिक हेल्थ कैंपेन ‘राइट टू प्रोटीन ने’. हिंदुस्तान से पहले व भी कई देश प्रोटीन की आवश्यकता व उसकी जागरुकता के लिए इस दिवस को अपना चुके हैं. हिंदुस्तान में इस दिन की आरंभ हिंदुस्तान में प्रोटीन की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करने, जागरुकता फैलाने व इसके फायदों के विषय में शिक्षित करने के लिए की गई है. कैंपेन से संबंधित लोगों का बोलना है कि इस दिवस को मनाने से लोगों को बड़े स्तर पर प्लांट व एनिमल प्रोटीन की विभिन्न किस्मों के बारे में पता चलेगा.

यही नहीं, वे डेली मील में बेहतर पोषण व स्वास्थ्य के लिए प्रोटीन की जरुरत के बारे में आवश्यक बातें जान सकेंगे. प्रोटीन डे 2020 की थीम ‘प्रोटीन में क्या है’ चुनी गई है. जिसका उद्देश्य है कि लोग खुद व दूसरों से प्रोटीन की विशेषता व फायदों की बात करें व जागरुकता फैलाएं. राइट टू प्रोटीन कैंपेन समाज में विशेषज्ञों के द्वारा प्रोटीन की जागरूकता व फैक्ट्स और मिथ को बताने का मकसद रखता है.

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