परमाणु बटन का खेल: किसके हाथ में ये कमान, जो ले सकता है एक्शन

परमाणु बटन का खेल: किसके हाथ में ये कमान, जो ले सकता है एक्शन

नई दिल्ली: अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया कल 20 जनवरी इनॉगरेशन डे पर संपन्न हो गई। इस बेहद खास अवसर पर ये प्रथा होती है कि पूर्व राष्ट्रपति नए राष्ट्रपति को न्यूक्लियर फुटबॉल सौपंता है। बता दें, न्‍यूक्लियर फुटबॉल को एक तरह से अमेरिका की परमाणु शक्‍त‍ियों का प्रतीक माना जाता है। तो अब आपको बताते हैं कि क्‍या अमेरिकी राष्‍ट्रपति के पास ये शक्‍त‍ि होती है कि वो कभी भी न्‍यूक्‍ल‍ियर बटन दबा सकता है तो इसके क्या नियम होते हैं।

‘न्यूक्लियर फुटबॉल’
दरअसल महाशक्तिशाली अमेरिका पूरी द‍ुनिया में अपनी परमाणु शक्‍तियों के लिए मशहूर है। जिसकी वजह से अमेरिका में न्यूक्लियर बटन को ‘न्यूक्लियर फुटबॉल’ कहा जाता है।

ऐसे में एक ब्रीफकेस में सिंबोलिक तौर पर जब भी अमेरिका का राष्ट्रपति कहीं जाता है या व्हाइट हाउस में होता है तो उसके साथ ये फुटबॉल भी होता है। ये भी बताते हैं कि उस काले रंग के ब्रीफकेस में एक सिस्टम होता है, जिसमें लांच कोड डालना होता है।

पर अब तकनीकी तौर पर ऐसा कोई बटन नहीं है। लेकिन अमेरिका में कुछ पहले से निर्धारित नियमों व प्रक्रियाओं के पालन और हाइटेक इक्विपमेंट्स के जरिए राष्‍ट्रपति सेना को न्यूक्लियर हमले का निर्देश दे सकता है।

अधिकार अमेरिकी कांग्रेस के पास
जिसके चलते इन इक्विपमेंट्स के इस्तेमाल का उद्देश्य यही है कि अमेरिकी सेना इस बात की पुष्टि कर सके कि आदेश देने वाले खुद उनके कमांडर इन चीफ यानी राष्‍ट्रपति हैं।

हालाकिं अमेरिका में क‍िसी भी युद्ध की घोषणा करने का अधिकार अमेरिकी कांग्रेस के पास होता है। और ये अध‍िकार पूरी तरह राष्ट्रपति के पास नहीं होता है। लेकिन इत‍िहास में कुछ राष्ट्रपतियों ने आधिकारिक तौर पर जंग का ऐलान न करते हुए सैन्य टुकड़ियों को मोर्चे पर भेजा है।

अब तक अमेरिकी कांग्रेस ने केवल पांच बार जंग का ऐलान किया है। वहीं राष्ट्रपतियों ने बिना जंग की घोषणा किए 120 बार से ज्यादा सेना को जंग में भेजा है।


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नई दिल्ली। भारत के खिलाफ दुश्मन देश पाकिस्तान आतंकियों की नई फौज खड़ी करना चाहता है। आए दिन हो रहे हमलों से तबाह हो रहे अफगानिस्तान को पाकिस्तान तालिबानी आतंकियों के हाथों में सौंप देना चाहता है। ऐसे में अमेरिका अफगानिस्तान में शांति के लिए तालिबानियों और अफगान नेताओं के बीच संधि कराने की लगातार कोशिशों में लगा हुआ है। यदि पाक की मंशा कुछ और ही है। ऐसे में भारत अफगानिस्तान में लोकतंत्र स्थापित करना चाहता है और इसके लिए वह अमेरिका के कदमों का समर्थन कर रहा है।

लोकतंत्र से ज्यादा गनतंत्र
ऐसे में इन सबको ध्यान में रखते हुए पाकिस्तानी सरकार के लिए लोकतंत्र से ज्यादा गनतंत्र अहम है। वहीं पाकिस्तान चाहता है कि काबुल में तालिबानी सत्ता संभाले। जबकि भारत का इस मामले में सीधा रुख है कि अफगानिस्तान में अफगान नेताओं का राज होना चाहिए।


इस बीच अमेरिका ने तालिबान के साथ फिर से बातचीत शुरू करने की घोषणा की है। धमाकों से हिले अफगानिस्तान के लिए अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि जालमे खलीलजाद जल्द ही काबुल, दोहा और अन्य क्षेत्रीय राजधानी का दौरा करेंगे।

पाकिस्तान तालिबानियों का मददगार
जिससे अफगानिस्तान में राजनीतिक स्थिरता लाई जा सके। रविवार को अमेरिकी प्रशासन ने बयान जारी कर यह बात कही थी। जोकि बाइडेन के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद खलीलजाद का ये पहला दौरा होगा। इस बारे में अमेरिका द्वारा जारी बयान के मुताबिक विशेष प्रतिनिधि जल्द ही दिल्ली और इस्लामाबाद का भी दौरा कर सकते हैं।

वहीं पाकिस्तान तालिबानियों का मददगार भी बना हुआ है। सालों पहले 2001 में जब अमेरिका ने हमला किया तो बहुत से तालिबानी नेताओं ने भागकर पाकिस्तान में शरण ले ली थी। वहीं पाक की धरती से ही तालिबानी लगातार अफगानिस्तान में हमले करने में लगे हुए हैं।


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