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भगवंत अनमोल ने कहा कि चेतन भगत की लोकप्रियता ने मुझे लेखक बनाया

शौक-शौक में कई किताबें लिख डालीं और सभी ही फेमस हुईं एक पुस्तक तो जागरण नीलसन बेस्ट सेलर की लिस्ट में भी शुमार हुई और यूपी हिंदी संस्थान द्वारा सम्मानित भी हुई इतना ही नहीं साहित्य अकादमी के युवा पुरस्कार से भी सम्मानित हुए अब नया उपन्यास बाजार में आ चुका है बात हो रही है युवा लेखक भगवंत अनमोल की

30 अगस्त, 1990 में जन्मे भगवंत अनमोल पेश से इंजीनियर और वाकचिकित्सक हैं ‘बाली उमर’, ‘जिंदगी 50-50’, ‘कामयाबी के अनमोल रत्न’ और ‘प्रमेय’ उनकी कृतियां हैं ‘प्रमेय’ उपन्यास के लिए उन्हें ‘साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार 2022’ से सम्मानित किया जा चुका है ‘प्रमेय’ उपन्यास विज्ञान और धर्म के बीच सत्ता संघर्ष दर्शाता है

भगवंत अनमोल का नया उपन्यास ‘गेरबाज़’ पेंगुइन स्वदेश (पेंगुइन रैंडम हाउस) से प्रकाशित हुआ है साहित्य जगत में ‘गेरबाज़’ अपने प्रकाशन के समय से ही चर्चा का विषय बना हुआ है इसमें एक स्थान पर भगवंत कहते हैं- “मर्द की खूबसूरती उसकी खाली जेब में होती है” भगवंत अनमोल “मर्द” की अलग परिभाषा गढ़ रहे हैं कोई कहता है मर्द को दर्द नहीं होता, कोई कहता है मर्द रोते नहीं हैं किसी का मानना है कि आदमी (मर्द) की ताकत उसकी जेब से मापी जाती है, लेकिन यहां भगवंत उल्टी ही गंगा बहा रहे हैं खैर इस युवा लेखक ने यह बात किस आधार पर कही, यह तो ‘गेरबाज़’ पढ़कर ही पता चलेगा लेकिन भगवंत अनमोल की नयी किताब, उनके पेशे, उनके लेखन को लेकर उनसे लंबी वार्ता हुई प्रस्तुत हैं इस वार्ता के चुनिंदा अंश-

पेशे से आप वाक डॉक्टर हैं वाक डॉक्टर क्या होता है? डॉक्टर होते हुए आप लेखक कैसे बने?

यहां पर वाक् डॉक्टर का अर्थ स्पीच थेरापिस्ट से है असल में मैं सॉफ्टवेर इंजिनियर रहा हूं बीटेक की डिग्री हासिल की है तीन वर्ष एक मल्टी नेशनल कंपनी में जॉब की है फिर जॉब छोड़कर कानपुर वापस चला आया मुझे अमेरिका भेजा जा रहा था, शायद कई लाखों का पैकेज होता, जो आम आदमी का सपना होता है लेकिन मैं स्वयं हकलाता रहा हूं, मैंने वह पीड़ा देखी है मेरे मन को गंवारा न हुआ मुझे लगा कि जिस परेशानी से मैं पीड़ित रहा, ऐसे देशभर में एक करोड़ से अधिक लोग हैं यदि उनकी सहायता की जा सके, उनका जीवन संवारा जा सके तो इससे बेहतर कुछ हो नहीं सकता इसीलिए मैंने कानपुर में लेखन के साथ स्पीच थेरेपी की नींव रखी कुछ लोग कह सकते हैं कि आधुनिक समय में यह गलत निर्णय है मैं बस इतना बोलना चाहता हूं, “जाके फटी न बेवाई का जाने पीर पराई

भगवंत अनमोल को उनके उपन्यास ‘प्रमेय’ के लिए साल 2020 में साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया था

जहां तक मेरे लेखक बनने का प्रश्न है कहते हैं कि आप लेखन को नहीं चुनते, लेखन आपको चुनता है ठीक उसी तरह से लिखने का शौक मुझे बचपन से था बचपन में तुकबंदी लिखा करता था, जिसे मैं कविता समझता था, होती भले नहीं थी बीटेक की पढ़ाई के दौरान ही एक उपन्यास लिख डाला उसके बाद एमएनसी में सॉफ़्टवेर इंजिनियर के तौर पर जॉब करने लगा, और जॉब के दौरान ही ‘ज़िन्दगी 50-50’ उपन्यास लिखा जब नौकरी छोड़ दी, स्पीच थेरेपी प्रारम्भ किया तो भी ‘बाली उमर’, ‘प्रमेय’ और अब ‘गेरबाज़’ आपके बीच आ है कुल मिलाकर यह बोला जाए कि मेरे प्रोफ़ेशन भले ही स्थिर न रहे हों, वह बदलते रहे हों, लेकिन मोहब्बत स्थिर रही मेरा लेखन अनवरत चालू रहा और अब तो मुझे लगता है कि यह पूरी ज़िन्दगी नहीं छूटने वाला है

मैंने कोई महारथ हासिल नहीं की है मैं बस अपनी बात पाठकों तक पहुंचाना चाहता हूं लेखन तो मेरा बचपन से ही साथ रहा जैसाकि मैंने कहा कि बचपन में कविताएं लिखता रहा, फिर डायरी लिखने का भूत सवार हुआ और फिर चेतन भगत की लोकप्रियता मुझे लगा मैं भी पॉपुलर हो जाऊंगा इस बात को मैं खुले दिल से स्वीकार करता हूं कि मुझे साहित्य से जोड़ने का काम चेतन भगत की लोकप्रियता ने किया है लेकिन जैसे-जैसे साहित्य को समझने लगा, लोकप्रियता का भूत उतरने लगा समझ आया कि साहित्य का अर्थ ही अलग है समाज का हित! फिर मैंने समाज भलाई की बात प्रारम्भ कर दी और समाज भलाई के लिए अपना जीवन लगा दिया

यह आपका बड़प्पन है जो आप कह रहे हैं कि मैंने बहुत उपलब्धि पा ली अभी तो कुछ नहीं पाया, अभी तो बस आरंभ की है आरंभ इस सन्दर्भ में नहीं कि मैं और पुरस्कार या उपलब्धियां पाना चाहता हूं मेरा मतलब, मेरे जीवन से है आज हमारे पास बड़ी-बड़ी कार हैं, कहीं भी जा सकते हैं इन्टरनेट हैं, दुनिया में किसी भी कोने के किसी आदमी से जुड़ सकते हैं यह सब इसलिए संभव हुआ क्योंकि हमारे पूर्वजों ने नई पीढ़ी के बारे में सोचा यदि हम भी अपनी नई पीढ़ी को अपने कार्यों और लेखन से थोड़ा बहुत भी दे पायें तो यह हमारी सफलता होगी और मैं इसीलिए प्रयासरत हूं

आप हमेशा नए विषयों पर लिखते हैं भले ही वह ‘ज़िन्दगी 50-50’ हो, ‘बाली उमर’ हो या ‘प्रमेय’ हो अब मैं यह जानना चाहता हूँ, ‘गेरबाज’ का विषय क्या है? इसके माध्यम से आप क्या संदेश देना चाहते हैं?

देखिये, कहते हैं दूसरो को जानने वाला बुद्धिमान कहलाता है और स्वयं को जानने वाला ज्ञानी मैं यह तो नहीं कहूंगा कि मैं ज्ञानी हूं लेकिन इतना जरूर है कि अपनी खूबियां और अपनी कमियां भलीभांति जानता हूं मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा हूं, कंप्यूटर साइंस से बीटेक किया है इसलिए मुझे भाषाई खेल नहीं आता कई लेखक अपने भाषा के मोहपाश में ऐसे बांधते हैं कि पाठक उसी में मोह में बंध जाता है वैसे मैं युवा हूं, मैंने तकनीकी शिक्षा हासिल की है, इसलिए मुझे भली–भाँति पता है कि मेरे अनुभव हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों के अनुभव से बिलकुल अलग हैं मैं उन विषयों पर अधिक लिखना चाहता हूं, जिनपर कम चर्चा हुई हो वैसे भी अब्दुल कलाम कह गए हैं, “सोच किसी के बाप की जागीर नहीं है यह किसी को, कहीं भी आ सकती है

जहां तक रही बात ‘गेरबाज़’ की तो यह हकलाहट की परेशानी पर हिंदी और अंग्रेजी में पहला उपन्यास है कहते हैं 100 में से एक आदमी हकलाहट की परेशानी से जूझता है मतलब यह सवा करोड़ से अधिक हिंदुस्तानियों की कहानी है फिर भी जब हम मुम्बई फिल्म इंडस्ट्री फिल्म या कोई कॉमेडी शो देखते हैं तो वहां पर इसे केवल मौज के तौर पर परोसा जाता है यह पुस्तक आपके लिए आंख खोलने वाली साबित होगी जो आपको उस पीड़ा से परिचित करवाएगी, जिसे अपनी हँसी मजाक का विषय समझते थे साथ ही ऐसे पीड़ित लोगों के लिए आशा की किरण भी दिखाएगी, जिससे वे एक बेहतर जीवन गुजार सके और ज़िन्दगी में प्रगति कर सके

सुना है कि यह उपन्यास आपकी आपबीती है! यदि यह सच है तो मैं यह जानना चाहता हूं कि ‘गेरबाज’ के पात्रों में आप किस पात्र को स्वयं के अधिक करीब पाते हैं?

मैंने पहले ही कहा है कि मैं हकलाहट की परेशानी से पीड़ित रहा हूं और यह पुस्तक उसी परेशानी पर है इस तरह देखा जाए तो आप ऐसा कह सकते हैं कि यह मेरी आप बीती है लेकिन सच कहूं तो यह मेरी ही नहीं, उन सवा करोड़ हिंदुस्तानियों की आप बीती है जो इस परेशानी से पीड़ित हैं

साथ ही साथ यह कहानी उन पुरुषो की कहानी भी है, जिनपर बचपन से धन कमाने का बोझ डाल दिया जाता है इस पुस्तक में प्रश्न यह भी किया गया है कि दहेज लेना बुरी बात है, लेकिन विवाह के लिए सरकारी जॉब वाला लड़का ढूंढना कौन सी अच्छी बात है? आप किस तरह का समाज बना रहे हैं, इतना दोहरापन कहां से लाते हैं? मैं इस पुस्तक में मुख्य भूमिका राघव, राघव शुक्ला के करीब हूं

इस इक्कीसवीं सदी में समाज और व्यापार के ढंग बिल्कुल से बदल रहे हैं इन्टरनेट और रील्स के जमाने में प्रिंटिड बुक्स के भविष्य को आप कहां देखते हैं?

देखिये कहते हैं, हर पांच वर्षों में बाजार बदलता है, सरकारें बदल जाती हैं तो यह बात तय मानिए कि व्यापार में भी परिवर्तन आते हैं इस बीच तकनीकी का जीवन में हस्तक्षेप बहुत बढ़ गया है सभी के हाथ में मोबाइल है और रील्स पर उंगलियां स्क्रॉल होती रहती हैं लेकिन प्रिंटेड बुक्स एवर ग्रीन हैं जैसे शहर के शोर-शराबे से दूर गांव में आम के पेड़ के नीचे बैठकर बांसुरी बजाना बेशक, हो सकता है किताबे पढ़ने वालों की संख्या कम हो जाए, लेकिन जिसे वह आनंद चाहिए जो पुस्तकों से मिलता है तो वह ढूंढकर पढ़ेगा

साहित्यकार और लेखक के मध्य तुलनाओं का बाजार गर्म है, आप इस पर कुछ बोलना चाहेंगे आप स्वयं को कहां देखते हैं?

देखिये, लेखक तो वह हुआ न! जो लिखता हो साहित्य का मतलब होता है सबका हित! समाज हित! वह लेखक जो सबके भलाई की बात करे वह साहित्यकार हर साहित्यकार लेखक तो होता है, लेकिन हर लेखक साहित्यकार नहीं हो सकता मेरा मानना है किताबें केवल पन्ने भरने का साधन मात्र नहीं हैं, न ही मात्र मनोरंजन का विषय! पुस्तकों ने दुनिया बदली है, अंधेरे में उजाला दिखाने का काम किया है पुस्तकों की आत्मा ही समाज भलाई की बात है, यदि वही नहीं रहेगा तो यह शरीर केवल काली स्याही से भरे हुए पन्ने भर हैं
जहां तक रहा मैं स्वयं को कहां देखता हूं? मैं कौन होता हूं स्वयं को देखने वाला! साहित्य बड़ी लम्बी प्रक्रिया है यदि मेरे लेखन से समाज में थोड़ा बहुत भी परिवर्तन आता है तो यह पाठक निर्धारित करेंगे कि मैं लेखक हूं या साहित्यकार! इसमें वक़्त लगता है

आपको यूपी हिंदी संस्थान द्वारा पुरस्कृत किया गया है पिछले साल ‘साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया है आपको बधाई! वैसे इन पुरस्कारों की एक लेखक के जीवन में क्या अहमियत होती है?

अगर सच जानना चाहें तो आज सच बताऊंगा, सच के सिवाय कुछ नहीं बताऊंगा जब कोई पुरस्कार मिलता है तो मेरा पूरा ध्यान उसकी रकम पर होता है असल मामला तो वही है बाकी यदि मैं कहूं कि पुरस्कार से मेरे ऊपर जवाबदेही बढ़ जाती है तो ऐसा बिलकुल नहीं है मैं पहले से ही अपनी जिम्मेदारी भली–भाँति निर्वाह कर रहा हूं उस आदमी से अधिक जीवन का मूल्य कौन समझ सकता है, जिसने जीवन और मरण के बीच लडाई लड़ी हो मेरे लिए पुरस्कार रकम लेकर आता है और साथ ही उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर लगाने के बाद भूल जाता हूं और अगले काम पे लग जाता हूं

आप लेखन की नई पीढ़ी के लिए कोई संदेश देना चाहते हैं?

देखिए सन्देश ने ही तो सारा गड़बड़ किया है हिंदी के तथाकथित प्रोफेसर हिंदी के नए विद्यार्थियों को यही सन्देश देते थे कि गंभीर लेखन ही सब कुछ है हिंदी साहित्य की पांच सौ प्रतियां भी नहीं बिक पाती आदि-आदि हिंदी साहित्य का विद्यार्थी उसे जस का तस मान लेता था जैसे एक हाथी के छोटे बच्चे को एक पतली रस्सी से बांध दिया जाता है वह तोड़ने की प्रयास करता है लेकिन तोड़ नहीं पाता जब तोड़ नहीं पाता तो वह हार मान लेता है और जब बड़ा हो जाता है, दीवार तोड़ने लगता है तब भी वह रस्सी तोड़ने की हौसला नहीं बांध पाता इसी तरह सन्देश देना, नए लेखकों की बहुमुखी प्रतिभा को बांधना भर है

जैसे- पहले माना जाता था कि पढ़कर-लिखकर ही नवाब बना जा सकता है आजकल कक्षा में सबसे पीछे बैठने वाले विद्यार्थी रील्स बनाकर बन रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, नेता बन रहे हैं और जीवन में खूब प्रगति कर रहे हैं किसी को लकीर का फकीर क्यों बनाना! सबका अपना अनुभव है, सबका अपना नजरिया है और सबका अपना तरीका हर कोई अपनी तरह से कार्य करने आया है उसे उसकी तरह से स्वीकार कीजिये

आजकल का अधिकतर समीक्षात्मक लेखन पुस्तकों को प्रमोट करने का काम कर रहा है, इससे लेखन की गुणवत्ता प्रभावित तो हुई है इस विषय पर आप की क्या राय है?

इसपर मेरे दो मत हैं, पुस्तकों का प्रमोशन होना चाहिए उसका स्वागत है लेकिन इस बीच कुछ गंभीर निंदा का भी स्वागत होना चाहिए गंभीर निंदा हमारे लेखन को बेहतर बनाती है और पाठको को सच से वाकिफ कराती है जहां रही प्रमोशन वाली टिप्पणियों की बात, तो आज मार्केटिंग के दौर में सब चल रहा है जब लोग जहर के सामान कोल्ड्रिंक का प्रचार देखकर पी रहे हैं तो किताबें इतनी बुरी भी नहीं

‘गेरबाज़’ आपकी अन्य पुस्तकों से किस प्रकार अलग है, कुछ बोलना चाहेंगे ऐसी बात जिससे पाठक पढ़ने के लिए उत्सुक हो जाएं?

देखिये, यह पुस्तक मैंने किसी लोकप्रियता या किसी सम्मान को पाने के लिए नहीं लिखी है इस पुस्तक को मेरी जिन्दगी ने मुझसे लिखवाया है मानो मेरा जन्म ही इसीलिए हुआ हो इस पुस्तक के माध्यम से मैं आप सभी पाठकों को यह सन्देश पहुंचाना चाहता हूं कि आप जिसे केवल हँसी मजाक के तौर पर देखते थे, वह इतना हँसी मजाक का विषय नहीं है उसकी पीड़ा को आप तक पहुंचाना चाहता हूं राष्ट्र की एक फीसदी जनता को बेहतर जीवन देने के उद्दयेश से भी यह पुस्तक लिखी गयी है और आप सभी को सतर्क करने के लिए भी यह पुस्तक आपके लिए आंखें खोलने वाली साबित होगी

भविष्य में क्या योजनाएं हैं लेखन को लेकर?

हम कौन होते हैं योजना बनाने वाले! समय के साथ बहने में ही चतुराई है अधिक योजना बनाना स्वयं को मन में बोझ डालना है जो होगा जैसा होगा, उसी मुताबिक आगे काम किया जाएगा लेकिन काम किया जाएगा, अब यह कैसे होगा, क्या होगा! यह तो समय बताएगा

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