श्रीहरन ने मद्रास उच्च न्यायालय के सामने भी दो महीने पहले रिहाई की अपील

श्रीहरन ने मद्रास उच्च न्यायालय के सामने भी दो महीने पहले रिहाई की अपील

चेन्नई: पूर्व पीएम राजीव गांधी हत्याकांड की दोषी नलिनी श्रीहरन ने समय से पहले रिहाई की मांग करते हुए सर्वोच्च कोर्ट का रुख किया है. इससे पहले श्रीहरन ने मद्रास हाई कोर्ट के सामने भी दो महीने पहले रिहाई की अपील की थी, जिसे नामंजूर कर दिया गया.

भारत के पूर्व प्रधान मंत्री की मर्डर में शामिल होने के लिए श्रीहरन को 14 जून, 1991 को अरैस्ट किया था. जानकारी के अनुसार वह सलाखों के पीछे सबसे लंबे समय तक रहने वाले वह स्त्री कैदी है. उल्लेखनीय है कि 25 अन्य लोगों के साथ, उसे 28 जनवरी, 1998 को चेन्नई में एक नामित टाडा न्यायालय ने सज़ा-ए-मौत सुनाई थी. एक वर्ष बाद, उच्चतम न्यायालय ने नलिनी, संथान, मुरुगन और पेरारीवलन की सज़ा-ए-मौत की पुष्टि की, तीन अन्य लोगों की सज़ा-ए-मौत को जीवन भर जेल से बदल दिया और 19 आरोपियों को मुक्त किया.

तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद की राय को स्वीकार करने के बाद, तमिलनाडु के गवर्नर ने 24 अप्रैल, 2000 को नलिनी की सज़ा-ए-मौत को जीवन भर जेल में बदल दिया. उसने 17 जून को मद्रास हाई कोर्ट को चुनौती दी, जिसने उसकी शीघ्र रिहाई के लिए याचिका को खारिज कर दिया.

मुख्य न्यायाधीश मुनीश्वर नाथ भंडारी और न्यायमूर्ति एन माला की खंडपीठ ने बोला कि हाई कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 142 के अनुसार विशेष शक्तियां प्राप्त नहीं हैं और इस प्रकार, उन्हें रिहाई नहीं दे सकता.

राजीव गांधी हत्याकांड

21 मई, 1991 को, पूर्व पीएम राजीव गांधी की तमिलनाडु के श्रीपैरंबदूर में एक लिट्टे आत्मघाती हमले में मर्डर कर दी गई थी, जब वे लोकसभा चुनाव के लिए एक चुनावी रैली को संबोधित करने के लिए मंच की ओर जा रहे थे.

नलिनी के अलावा, उसके पति मुरुगन, टी सुथेंद्रराजा, जयकुमार, रॉबर्ट पायस और पी रविचंद्रन जीवन भर जेल की सजा काट रहे हैं. 18 मई को एक बड़े घटनाक्रम में, शीर्ष न्यायालय ने पेरारिवलन को रिहा करने का आदेश दिया, जिसमें तमिलनाडु के गवर्नर द्वारा संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार अपनी शक्ति का प्रयोग करने में अक्षम्य देरी का हवाला दिया गया, जो उन्हें किसी दोषी को क्षमा करने या सजा को कम करने का अधिकार देता है.