सुबह जांचें कराने से मिलती है ये बीमारी

सुबह जांचें कराने से मिलती है ये बीमारी

सैम्पल की जाँच माइक्रोबायोलॉजी, पैथोलॉजी और बायोकैमिस्ट्री प्रयोगशाला में होती. 01 बार लिए गए सैंपल से कई तरह कई तरह की जांचें हो सकती हैं. रोगी को बार-बार इंजेक्शन से चुभन नहीं होती. 8-9 बजे के बीच या इससे पहले यानी प्रातः काल के समय की गई जांचों से रोग की पुष्टि ज्यादा अच्छे से होती है.Image result for सुबह जांचें कराने से मिलती है ये बीमारी

रोगों की जाँच के लिए चिकित्सा जगत में खासतौर पर तीन तरह की प्रयोगशाला का इस्तेमाल होता है.संक्रामक रोगों की जाँच के लिए माइक्रोबायोलॉजी विभाग में सैंपल की जाँच होती है. वहीं पैथोलॉजी में खून संबंधी व कोशिका (टिशु) से जुड़ी जांचें जबकि बायोकेमेस्ट्री में ब्लड में कोलेस्ट्रॉल, शुगर, क्रिएटिनिन व लिपिड प्रोफाइल लेवल की जाँच कर रिपोर्ट तैयार की जाती है.

बीमारी को जानने के लिए जब सैंपल विभिन्न विभागों की मशीनों में लगाते हैं तो संबंधित विभाग के डॉक्टर क्वालिटी कंट्रोल पर नजर रखते हैं जिसके बाद मशीन डाटा देती है. एक्सपर्ट चिकित्सकों की टीम डाटा की स्टडी और एनालिसिस करने के बाद रिपोर्ट तैयार करती है जिसके बाद आदमी में रोग की पुष्टि होती है. इसी रिपोर्ट के आधार पर विशेषज्ञ दवा, डोज और उपचार का उपाय तय करते हैं.

एक सैंपल से कई जांचें -
सेंट्रलाइज सैंपल कलेक्शन के तहत कोई आदमी किसी समस्या को लेकर अस्पताल पहुंचता है तो उसे एक बार सैंपल देना होता है. इसी सैंपल को भिन्न-भिन्न टैस्ट ट्यूब में डालकर विभागों में भेजते हैं.इस सुविधा से रोगी को बार-बार सुई की चुभन से परेशान व सैंपल देने के लिए भागदौड़ नहीं करनी पड़ती है.

स्टे्रन बदलने से फैलती बीमारी -
मिशिगन स्टे्रन वायरस की प्रकृति में परिवर्तन से रोग तेजी से फैलते हैं क्योंकि उस वक्त उसकी रोकथाम और उपचार के लिए कोई उचित व्यवस्था और दवा नहीं होती. इंफ्लूएंजा वायरस में जेनेटिक परिवर्तन को एंटीजेनिक ड्रिफ्ट और दो अलग स्ट्रेन के मिलने से बने नए वायरस की प्रक्रिया को एंटीजेनिक शिफ्ट कहते हैं. मौसमी परिवर्तन से लोगों की इम्युनिटी घटती है जिसके लिए वैक्सीन लगवाते हैं. यह स्ट्रेन संबंधी दिक्कतों की संभावना घटाती है.

भोजन के बाद टैस्ट -
भूखे पेट व कुछ खाने के बाद मुख्य रूप से ईएसआर, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल की जाँच होती है. इससे शरीर में कुछ भी खाद्य पदार्थ न होने या इनकी उपस्थिति में शरीर में क्या परिवर्तन हैं, जानकारी मिलती है. इनके आधार पर एक्सपर्ट रोग की पॉजिटिव और नेगेटिव रिपोर्ट तैयार करते हैं.

गड़बड़ी न हो - कई बार देखा जाता है कि एक ही दिन में रोगी एक तरह की जाँच भिन्न-भिन्नप्रयोगशाला से करवाता है जिसकी जाँच रिपोर्ट एक दूसरे से भिन्न होती है. इसका प्रमुख कारण कई बार सैंपल कलेक्शन में बरती गई लापरवाही, जाँच के लिए इस्तेमाल हुए सॉल्युशन या इंजेक्शन में किसी तरह की खराबी मुख्य वजह है. मशीन में किसी तरह की तकनीकी खराबी से भी गलत रिपोर्ट बनने के मुद्दे सामने आते हैं. ऐसी स्थिति में एक बार चिकित्सक से मिलने के बाद अच्छी प्रयोगशाला से क्रॉस चेक जरूर करवाना चाहिए.

इसलिए प्रातः काल जाँच - यूरिन जाँच प्रातः काल इसलिए कराते हैं क्योंकि रातभर यूरिन ब्लैडर में भरा रहता है. उसकी जाँच होने पर बैक्टीरिया का पता सरलता से चल जाता है. इसी तरह टीबी की जाँच के लिए बलगम का सैंपल प्रातः काल उठते ही निकालकर जमा किया जाता है. इसका कारण उस सैंपल में किटाणु पर्याप्त मात्रा में आ जाते हैं जिनकी पहचान जाँच के बाद सरलता से हो जाती है.

स्टे्रन बदलने से फैलती बीमारी -
मिशिगन स्टे्रन वायरस की प्रकृति में परिवर्तन से रोग तेजी से फैलते हैं क्योंकि उस वक्त उसकी रोकथाम और उपचार के लिए कोई उचित व्यवस्था और दवा नहीं होती. इंफ्लूएंजा वायरस में जेनेटिक परिवर्तन को एंटीजेनिक ड्रिफ्ट और दो अलग स्ट्रेन के मिलने से बने नए वायरस की प्रक्रिया को एंटीजेनिक शिफ्ट कहते हैं. मौसमी परिवर्तन से लोगों की इम्युनिटी घटती है जिसके लिए वैक्सीन लगवाते हैं. यह स्ट्रेन संबंधी दिक्कतों की संभावना घटाती है.

लैब टैस्ट -

वायरस प्रयोगशाला : इसमें वायरस के म्यूटेशन और एंटीजेनिक परिवर्तन (प्रकृति) को परखा जाता है.इसके लिए प्रयोगशाला में इन वायरस की सिक्वेंसिंग कर इनके दुष्प्रभावों के बारे में सरलता से पता लगाया जा सकता है.
ड्रग रेसिस्टेंस सर्विलांस : इससे रोगी में दवा के प्रभाव और दवा की डोज का पैमाना तय होता है. इससे दवा के प्रभाव के अतिरिक्त रोगी की इम्युनिटी के हिसाब से दवा का क्या स्तर होगा, का पता लगाते हैं.

मल्टीप्लेक्स पीसीआर : इससे एक बार में एक सैंपल से कई वायरस को एकसाथ देख सकते हैं.दिमागी बुखार, जेई और स्वाइन फ्लू वायरस की जाँच में सहायक.
बायो फायर : इससे एक घंटे में 12-20 प्रकार के बैक्टीरिया की पहचान करते हैं. यह जाँच थोड़ी महंगी है और रोगी को इसके लिए 12 हजार रुपए खर्च करने पड़ते हैं.
ऑटोमेटेड सिस्टम : करीब 600 रु। के खर्च के बाद जाँच रिपोर्ट तुरंत मिलती है. ये वेंटिलेटर, आईसीयू या गंभीर रोगियों के उपचार के दौरान उपयोगी है. मैनुअल जाँच के लिए रोगी को 75 रु।खर्च करने होते हैं लेकिन रिपोर्ट 24 से 30 घंटे में मिलती है.