जहां के लोग अपना पता बताने में शर्म से हो जाते हैं पानी-पानी, आखिर क्यों?

जहां के लोग अपना पता बताने में शर्म से हो जाते हैं पानी-पानी, आखिर क्यों?

नई दिल्ली: ऑस्ट्रिया के एक गांव के लोगों को कई सालों से भारी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है। क्योंकि वहां के लोगों को अपने गांव का नाम बताने में शर्म आती है।

इस गांव का नाम फकिंग (F***ing) है। ये गांव अपर ऑस्ट्रिया के इनवर्टेल इलाके के टार्सडॉर्फ म्यूनिसिपिलटी के अंतर्गत आता है। जिसे फकिंग (F***ing) विलेज के नाम से जाना जाता है।

ये गांव साल्जबर्ग से 33 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जो कि जर्मनी के बॉर्डर पर स्थित है। इस गांव में काफी दूर –दूर से पर्यटक आते हैं। उनका आना-जाना साल 2005 के बाद से और भी ज्यदा बढ़ गया है। पर्यटक इसके साइन बोर्ड के नीचे तस्वीरें लेते और उसे वायरल करते। कुछ ने साइन बोर्ड ही चोरी कर लिया।

2020 की गणना के अनुसार इस गांव की आबादी 106
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार वर्ष 2020 की गणना के अनुसार फकिंग (F***ing) गांव में मात्र 106 लोग रहते हैं। यहां पर 32 घर बने हुए हैं, जिनमें ये लोग रहते हैं।

ऐसा माना जाता है कि इस गांव की स्थापना 6वीं शताब्दी में बवेरियन समुदाय के एक शख्स फोको (Focko) ने की थी। उस समय ऑस्ट्रिया के इस इलाके में ऑस्ट्रोगॉथ्स साम्राज्य का राज था। पहली बार इस गांव का नाम कागजों में साल 1070 में दर्ज हुआ था।

अब तक कई बार बदला जा चुका है इस गांव का नाम
शुरूआत में इस गांव का नाम लैटिन में रखा गया। पहले इसका नाम एडेलपर्टस डे फसिंनजिन रखा गया था। धीरे-धीरे लोगों ने नाम को बदलना शुरू कर दिया। साल 1303 में इसका नाम फकचिंग (Fukching) हो गया।

उसके बाद 1532 में फगखिंग (FugKhing) हो गया। फिर 18वीं सदी तक आते-आते लोग इसे फकिंग (F***ing) के नाम से बुलाने लगे।

इतिहासकारों की मानें तो ऑस्ट्रियन इतिहास और किताबों के अनुसार इसे फूकिंग बुलाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि इस गांव को फोको (Focko) ने स्थापित किया था।

प्राप्त जानकारी के अनुसार सेकेंड वर्ल्ड वॉर के समय जर्मनी के सैनिकों ने जब आना-जाना शुरू किया तब उनकी नजर इस गांव के ऊपर पड़ी थी। उसके बाद इसका नाम यूरोपीय देशों में लोगों की जुबान पर अपने आप ही आने लगा।

लोग इसके साइन बोर्ड के नीचे तस्वीरें लेते थे और उन्हें चाव से दिखाते थे। इस गांव को देखने ब्रिटिश पर्यटक सबसे ज्यादा आते हैं। कई बार तो बसों से लोग आते हैं, सिर्फ गांव और उसका साइन बोर्ड देखने। धीरे धीरे इस गांव का नाम आस पास के शहरों में फेमस हो गया।

इस गांव में नहीं होता कोई भी बड़ा अपराध
हालांकि ध्यान देने वाली बात ये भी है कि इस गांव में कोई क्राइम नहीं होता। पिछले डेढ़ दशक में सबसे ज्यादा अपराध जो रिकॉर्ड किया गया है वो है इस गांव के नाम का साइनबोर्ड का चोरी होना।

इस बारें में मेयर आंद्रिया होल्जनर का कहना है कि यूरोपीय या अन्य देशों के पर्यटकों को जब इस गांव का नाम पता चलता था तो वो इस गांव की सीमा पर लगे साइन बोर्ड के पास आकर फोटो खिंचवाते थे और उसे उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट करते थे। इस वजह से फकिंग (F***ing) गांव की बदनामी हो रही थी। इसलिए अब इसका नाम बदलकर फगिंग रखने का फैसला लिया गया है।


लोको पायलट ने ऐसे बचाई गजराज की जान, यूजर्स कर रहे हैं सलाम

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सोशल मीडिया पर रोजाना दर्जनों वीडियोज शेयर होते हैं। इनमें कई वीडियो ऐसे होते हैं, जो दिल को छू जाते हैं। इस क्रम में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जो दिल को छूने वाला है। इस वीडियो में साफ देखा जा सकता है। अन्य दिनों की तरह हाथी पटरी पर मस्तमौला होकर टहल रहा है। वीडियो देख ऐसा प्रतीत होता है कि हाथी पटरी पारकर जंगल की तरह जा रहा है।


हालांकि, दूरी कम करने के लिए हाथी पटरी का सहारा ले रहा है। हाथी ट्रेन से बेखबर होकर अपनी मस्ती में आगे बढ़ रहा है। उसी समय एक ट्रेन गुजरने वाली होती है। ट्रेन भी अपनी रफ्तार में आगे बढ़ रही है कि अचानक लोको पायलटों की नजर हाथी पर पड़ती हैं। ऐसी स्थिति में दोनों पायलट सोच में पड़ जाते हैं कि आने वाले कुछ सेकेंड में क्या किया जाए? तभी दोनों आपातकालीन ब्रेक लगाने की बात करते हैं। हालांकि, गतिशील ट्रेन में आपातकालीन ब्रेक लगाने से दुर्घटना का खतरा रहता है। इसके बावजूद लोको पायलटों ने सूझबुझ से काम को अंजाम दिया। इससे गजराज की जान बच गई।

इस वीडियो को भारतीय वन सेवा के अधिकारी सुशांत नंदा ने सोशल मीडिया ट्विटर पर अपने अकांउट से शेयर किया है। इस वीडियो को खबर लिखे जाने तक 17 हजार से अधिक बार देखा गया है। वहीं, तकरीबन 2 हजार लोगों ने पसंद किया है। जबकि, कुछ लोगों ने कमेंट कर लोको पायलट की जमकर तारीफ की है। एक युजर ने लिखा है-हाथी राजा कहा चले। सूंड उठा के चले। पटरी से उतर जाओ ना। कई लोगों ने लोको पायलट को उनके सराहनीय काम के लिए सलाम किया है।


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