आखिर पुलिस एनकाउंटर पर देश क्यों मना रहा है जश्न!

आखिर पुलिस एनकाउंटर पर देश क्यों मना रहा है जश्न!

हैदराबाद (Hyderabad Gangrape and murder case) में महिला चिकित्सक के रेप व मर्डर के आरोप में गिरफ्तार आरोपियों के एनकाउंटर के बाद जिस तरह पुलिस की तारीफ हो रही है, उससे एक बात तय है कि देश इस पुलिस एनकाउंटर से खुश है। दशा यहां तक हैं कि देश के भिन्न-भिन्न हिस्सों में पुलिस एनकाउंटर पर जश्न मनाया जा रहा है। महिलाएं पुलिसवालों को राखी बांध रही हैं। कोई भी ये जानना नहीं चाहता कि आखिर पुलिस एनकाउंटर में जो हुआ वो कैसे हुआ! क्या पुलिस की जाँच के दौरान दशा हकीकत में इस कदर हो गए थे कि पुलिस के पास एनकाउंटर को छोड़ कोई रास्ता नहीं बचा था?

क्या सच में आरोपी भागने व पुलिसवालों से हथियार छीनने की प्रयास कर रहे थे? इसका जवाब जो भी हो, लेकिन एक बात तो तय है कि देश के लोग अब न्याय के लिए लंबा इंतजार नहीं करना चाहते। क्योंकि इस तरह की मांग सिर्फ जनता ही नहीं कर रही थी, बल्कि देश में कानून बनाने वाली संसद में भी अपराधियों को जनता को सौंप देने तक की मांग उठी।

इस एनकाउंटर के बाद आम लोगों के साथ-साथ यूपी की पूर्व सीएम मायावती, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, फिल्म जगत से जुड़े लोग पुलिस की इस कार्रवाई की तारीफ कर रहे हैं। ये दशा तब हैं जब जश्न मनाने वाले लोगों में से ज्यादातर कभी न कभी पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठा चुके हैं!पुलिस में अपना हीरो क्यों तलाश रहे हैं लोग!
दरअसल इस पुलिस एनकाउंटर के बाद जश्न की जो फोटोज़ आ रहीं हैं, वो सिस्टम पर उठ रहे विश्वास को दिखाती हैं। देश के आम आदमी को अब लगने लगा है कि देश में सिस्टम से कुछ नहीं होने कि सम्भावना चाहें वो न्याय की लड़ाई ही क्यों न हो। ऐसे में वो सिस्टम के विरूद्ध अपने उस हीरो की तलाश में है, जो दशकों से सिनेमा के पर्दे पर उसका मनोरंजन करता रहा है।

उनके लिए कानून व न्याय नामक शब्द बेमानी है। उसका कार्य सिर्फ बदला लेना है व वो हर उस वस्तु का बदला लेता है जो उसके साथ घटा है व सिनेमा के पर्दे पर उस हीरो को देखकर पब्लिक ताली बजाती है। उसका हीरो अगर कहीं लूट भी करता है तो ठीक है। उसका हीरो खून भी करता है तो ठीक है। लेकिन हमें समझना होगा कि हमारे संविधान या कानून में बदला नहीं न्याय की बात होती है।

इसलिए सेल्फ डिफेंस में खून को खून नहीं माना जाता, हर घटना व दुर्घटना की परिस्थितियों का आकलन किया जाता है, जो आरोपी गिरफ्त में आए हैं क्या ठीक में वहीं आरोपी हैं इसकी जाँच की जाती है। ये प्रक्रिया लंबी है, लेकिन न्याय के लिए महत्वपूर्ण भी है। हालांकि हमारा फिल्मी हीरो इसमें यकीन ही नहीं रखता। उसका तो बदला ही न्याय है, लेकिन यहां देखने वाली बात है कि आखिर हीरो पैदा कब होता है। जब उस इलाके के लोगों का विश्वास कानून व पुलिस से उठ जाता है। तो क्या वाकई इस देश में लोगों का विश्वास पुलिस व कानून से उठता जा रहा है।

आखिर क्यों उठ रहा है सिस्टम से भरोसा
यहां देखने वाली बात ये है कि आखिर लोगों का कानून से विश्वास क्यों उठ रहा है! जिस संसद पर कानून बनाने की जिम्मेदारी है, उसमें एक तिहाई से ज्यादा सांसदों पर मुकदमें दर्ज हैं। एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 539 सांसदों में 233 यानी 43 फीसदी सांसदों पर किसी न किसी क्राइम में मुद्दा दर्ज है। एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ दिल्ली में 4 साल में पुलिसवालों पर बलात्कार के 53 मामले दर्ज हुए, जिसमें सिर्फ 11 जेल गए। इनमें किसी को सजा नहीं मिली, जबकि 8 आरोपी तो पीसीआर में ड्यूटी तक कर रहे हैं।

अदालतों में समय से न्याय नहीं मिल रहा है। जिस निर्भया काण्ड के बाद देश हिल गया, उसके आरोपियों की सजा अब तक सिर्फ कागजों पर है, जबकि देश में सरकार बनने, नेताओं की जमानत जैसे बड़े मामले पर न्यायालय के निर्णय महीनों में ही आ जा रहे हैं। ऐसे में देश की आम जनता का भरोसा कानून बनाने वाली संसद, कानून का पालन करने वाली पुलिस व कानून का पालन न करने पर सजा देने वाली न्यायपालिका तीनों से उठता जा रहा है व वो सड़क पर न्याय की मांग करने लगी है।